गोविन्द बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण एवं सतत विकास संस्थान

(पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार का स्वायत्तशासी संस्थान)

कोसी-कटारमल, अल्मोड़ा-263643, भारत

 

 

 

 

 

नागरिक चार्टर

 

संस्थान के बारे में......

गोविन्द बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण एवं सतत विकास संस्थान (जीबीपीएनआईएचईएसडी) की स्थापना 1988-89 में भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत के जन्म शताब्दी वर्ष के दौरान पर्यावरण और वन मंत्रालय, भारत सरकार के एक स्वायत्त संस्थान के रूप में की गई है जिसकी पहचान वैज्ञानिक ज्ञान को उन्नत करने, एकीकृत प्रबंधन रणनीति तैयार करने, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए अपनी क्षमता का प्रदर्शन करने और संपूर्ण भारतीय हिमालय क्षेत्र (आईएचआर) में पर्यावरण की दृष्टि से ठोस विकास सुनिश्चित करने के लिए एक केंद्रीय एजेंसी के रूप में की गई है। यह संस्थान सामाजिक, पारिस्थितिक, आर्थिक और भौतिक प्रणालियों के बीच के जटिल संबंधों में संतुलन बनाए रखने का प्रयास करता है, जिससे भारतीय हिमालय क्षेत्र (आईएचआर) में स्थिरता बनाई रखी जा सके। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए संस्थान प्राकृतिक और सामाजिक विज्ञानों के पारस्परिक संबंधों पर जोर देते हुए अपने सभी अनुसंधान और विकास कार्यक्रमों में बहु-विषयक और समग्र दृष्टिकोण का अनुसरण करता है। इस प्रयास में नाजुक पर्वतीय पारितंत्रों, ज्ञान प्रणालियों और प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग के संरक्षण पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाता है। विभिन्न कार्यक्रमों की दीर्घकालिक स्वीकार्यता और सफलता के लिए स्थानीय निवासियों की भागीदारी सुनिश्चितत करने के लिए एक सार्थक प्रयास किया जाता है। विभिन्न हितधारकों के लिए प्रशिक्षण,पर्यावरण शिक्षा और जागरूकता संस्थान के सभी अनुसंधान और विकास कार्यक्रमों के आवश्यक घटक हैं।

 

संस्थान की वेबसाइट: http://gbpihed.gov.in

 

व्यापक उद्देश्य (अधिदेश)..... 

 

संगठनात्मक संरचना.....

संस्थान की भारतीय हिमालय क्षेत्र के सतत विकास के प्रति सुदृढ़ प्रतिबद्धता है। इसका मुख्यालय कोसी-कटारमल, अल्मोड़ा उत्तराखंड में है और इसकी चार क्षेत्रीय इकाइयां नामतः हिमाचल इकाई, मोहल कुल्लू (हिमाचल प्रदेश), गढ़वाल इकाई, श्रीनगर (पौड़ी गढ़वाल), सिक्किम इकाई पंथांग (टडोंग, सिक्किम) और पूर्वोत्तर इकाई ईटानगर (अरुणाचल प्रदेश) में हैं। इसका कार्यक्षेत्र समस्त हिमालय क्षेत्र में फैला है जो लगभग 591000 वर्ग किमी. क्षेत्रफल में फैला है। इसके अंतर्गत हिमालय के सात राज्य अर्थात जम्मू एवं कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तर उत्तरांचल, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, मेघालय, असम और पश्चिम बंगाल की पहाड़ियां शामिल हैं।

 

अनुसंधान और विकास - समूह और विषय.....

 

समूह - 1: सामाजिक-आर्थिक विकास (एसईडी) और पर्यावरण आकलन तथा प्रबंधन (ईएएम)

पारिस्थितिकी, सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक विविधता के कारण भारतीय हिमालय क्षेत्र (आईएचआर) की अद्वितीय पारिस्थितिक संरचना विविधतापूर्ण है। परंपरागत रूप से यह प्रणाली संसाधनों के पुनष्चक्रण (रीसाइक्लिंग) की अवधारणा पर मुख्य रूप से निहित है, तथापि यह प्रणाली जनसंख्या के दबाव और विकास की जरूरतों के कारण तेजी से नष्ट होने के दौर से गुजर रही है। उपर्युक्त को ध्यान में रखते हुए, संस्थान की सामाजिक-आर्थिक विकास (एस ई डी) की संकल्पना आजीविका वृद्धि, स्थायी पर्यटन, उद्यमशीलता और स्व-रोजगार, स्वदेशीज्ञान और प्रवास और इसके सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभाव आदि पहचानी गई गतिविधियों पर केंद्रित है। आई एच आर के विकास में अब तक मनुष्य और प्रकृति के बीच संघर्ष भी शामिल है। शहरी उद्योगों द्वारा पहाड़ियों का खनन, बड़े पैमाने पर लकड़ी की कटाई करने अथवा पहाड़ी नदियों से जल-विद्युत ऊर्जा के माध्यम से बड़े संसाधन आधार के शोषण का सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार के प्रभाव पड़े हैं। इसलिए, इस तरह के विकास हस्तक्षेपों को पर्यावरण लागत की परंपरागत व्यावहारिक लागत-लाभ विश्लेषण के साथ एकीकृत करने की आवश्यकता है। वैज्ञानिक आकलन के माध्यम से पर्यावरण के बढ़ते हुए खतरों के लिए रणनीतियांs की पहचान करना और आईएचआर की पारिस्थितिकी और आर्थिक सुरक्षा हासिल करना संस्थान के पर्यावरण आकलन और प्रबंधन (ईएएम) का प्रमुख कार्य है, जो पहाड़ विनिर्दिष्ट रणनीतिक पर्यावरण आकलन (एसईए) और पर्यावरण  प्रभाव आकलन (ईआईए), एयरोसौल्ज और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, आपदा का न्यूनीकरण और प्रबंधन और शहरी क्षेत्रों के पर्यावरण प्रबंधन आदि पर जोर देता है।

 

समूह - 2: जलागम प्रक्रियाएं और प्रबंधन (डब्ल्यू.पी.एम.) और ज्ञान उत्पाद तथा क्षमता निर्माण (के.सी.बी)  

भूमि और जल, संसाधन आधार की रीढ़ का निर्माण करते हैं जिन पर कृर्षि, वानिकी और पशु जगत निर्भर करते हैं। भूख को कम करने के सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने, जल की कमी का सामना करने और पर्यावरण के बारे में वहनीयता प्राप्त करने के लिए जलागम सेवाओं का उपयोग और अधिक दक्षता से करने के लिए पर्यावरण से समझौता किए बिना विधियों का विकास करना महत्वपूर्ण है। हिमालय के संदर्भ में, ये चुनौतियां पर्वतों के पारितंत्र की नाजुकता और जटिलता के कारण और भी बड़ी हैं। एक एकीकृत समयबद्ध तरीके से इनमें से कुछ चुनौतियों का समाधान करने के लिए यह समूह प्रणाली उपागम में पर्वत विनिर्दिष्ट संसाधन प्रबंधन व्यवहार सुदृढ़ीकरण के विशेष लक्ष्य के साथ प्रयोगकर्ता समूहों की भागीदारी और अपस्ट्रीम एवं डाउनस्ट्रीम संबंधों सहित जलागम स्तर पर पारितंत्र प्रक्रियाओं के प्रचालन के अध्ययन पर ध्यान केंद्रित करता है। यह समूह अपने अनुसंधान उत्पादों जैसे अत्याधुनिक प्रविधियों/उपागमों, मॉडलों और नीतियों इत्यादि द्वारा संस्थागत पहुंच में वृद्धि संबंधी गतिविधियों की भी व्यवस्था करता है। उपर्युक्त के अलावा, विशेष रूप से बनाए गए डिजाइन माड्यूल, प्रशिक्षण कार्यक्रमों, पुस्तकालय एवं सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं द्वारा क्षमता निर्माण का काम किया जा रहा है जो बड़ी मात्रा में मानव संसाधन विकास में सहायता करता है। ये संस्थान की अनुसंधान और विकास गतिविधियों के अन्य महत्वपूर्ण ज्ञेत्र हैं।

 

समूह 3: जैव विविधता संरक्षण और प्रबंधन (बी.सी.एम.) और जैव प्रौद्योगिकीय अनुप्रयोग (बी.टी.ए.)

मानव कल्याण के लिए जैविक संसाधनों का महत्व प्राचीन समय से ही व्यापक और संदेह से परे है। बढ़ती हुई मानव जनसंख्या और जैव संसाधनों की मांग के साथ इसका सतत और संगत प्रयोग संपूर्ण विश्व के लोगों की उत्तरजीवितता, विशेष रूप से भारतीय हिमालय क्षेत्र के निवासियों के लिए आवश्यक है, जो लगभग कुल 5910000 वर्ग किमी (भारत का 18 प्रतिशत) भौगोलिक क्षेत्र में फैला है और देश की कुल जनसंख्या का लगभग 3.77 प्रतिशत जनसंख्या यहॉं निवास करती है। इस क्षेत्र में अनेक प्रकार के पौधे, जन्तु और सूक्ष्मजीवी प्राणी पाए जाते हैं और इसे जैव विविधता का महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। यह लोगों की आजीविका और आर्थिक समृद्धि में भी पर्याप्त सहायता प्रदान करता है। तथापि, विश्व के बदलते परिदृश्य अधिक से अधिक अनाज, औषधि और अन्य उत्पादों के साथ-साथ भारी औद्यौगिकीकरण की आवश्यकता पर जोर देता है जिसने वनस्पति विज्ञानियों को जैव विविधता का संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, बेहतर उत्पादकता के लिए जैव प्रौद्योगिकी हस्तक्षेप आदि जैसे गंभीर मुद्दों पर ध्यान देने के लिए मजबूर किया है। यह समूह जैव विविधता संरक्षण और प्रबंधन, और भारतीय हिमालय क्षेत्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार लाने के लिए जैव प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग जैसे पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करता है।

 

विषयों की भूमिका और कार्य

 

विषय 1: जलागम प्रक्रियाए और प्रबंधन (डब्ल्यू.पी.एम)

हिमालय के जलागम अनेक प्रबंधित और प्राकृतिक भू प्रयोग प्ररूपों जैसे उत्तर-पश्चिम और मध्य में सीढ़ीनुमा/टेरास कृर्षि, कृर्षिवानिकी और फलोद्यान, पूर्वोत्तर हिमालय क्षेत्र में झूम खेती को सहायता प्रदान करते हैं। इसके अलावा, प्राकृतिक वन, चारागाह, अपक्षय भूमि, ग्लेशियर और हिमाच्छादित क्षेत्र अन्य महत्वपूर्ण भू प्रयोग हैं जो जलागम प्रक्रिया को विनियमित करते हैं। हाल ही में स्वीकृत संयुक्त राष्ट्र सहस्राब्दि विकास का लक्ष्य सुरक्षित पेय जल की पहुंच के बिना रहने वाले लोगों की आबादी को आधा करना और भुखमरी में कमी लाना है। इस संकल्पना की गतिविधियों में समस्या की पहचान, शोध निष्कर्षों के संश्लेषण से पारितंत्र प्रक्रियाओं का आकलन और मात्रात्मकता और लाभार्थियों की सहभागिता से प्रथाओं/पैकेज का विकास करना शामिल है। यह संकल्पना जलागम सेवाओं और प्रबंधन पर काम करने, भूमि और जल प्रयोग नीति, जलवायु परिवर्तन के परिणामों, हिमालय की खेती प्रणाली में सुधार, प्रासंगिक स्वदेशीज्ञान प्रणाली और ऊर्जा की घरेलू आवश्यकताओं आदि पर जोर देती है। इस संकल्पना के मुख्य उद्देष्य हैं: 1) जलागम प्रक्रियाओं की गतिशीलता और जलागम स्केल पर पारितंत्र के घटकों के मूल्याकन का अध्ययन (2) बेहतर आर्थिक और पारिस्थितिकीय वहनीयता के लिए जलागम सेवाओं का अधिकतम प्रयोग करने के लिए साधनों का विकास करना(  3) एकीकृत जलागम प्रबंधन द्वारा संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए रणनीतियों का विकास करना।

 

विषय 2: जैव-विविधता संरक्षण और प्रबंधन (बीसीएम)   

जीन, प्रजातियों और पारिस्थितिकी तंत्र के स्तर पर जैव विविधता का महत्व इसके उपयोग, संरक्षण और प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण है। जैव विविधता की मान्यता और लक्षण वर्णन, मुख्य रूप से वर्गीकरण, आनुवंशिकी, और पारिस्थितिकी अध्ययन पर निर्भर करता है। जैव विविधता के संरक्षण के उपाय जैसे विभिन्न कृषि जलवायु क्षेत्रों में जीव संग्रहालय/पहुंच की स्थापना और रखरखाव, संवर्धनात्मक कार्यक्रमों को बढ़ावा देने के लिए गुणवत्तापूर्ण वृक्षारोपण सामग्री और स्थानीय, क्षेत्रीय, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर हितधारकों की क्षमता को बढ़ाने के लिए प्रबंधन और जैव विविधता पर जानकारी का प्रसार सुनिश्चित करने में मदद करेंगे। इस तरह की क्षमताएं विभिन्न स्तरों पर जैव विविधता को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण हैं, जो हवा, पानी, मिट्टी और अन्य के संदर्भ में मानव जीवन के लिए आवश्यक हैं। सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण के लिए जैव विविधता के महत्व को समझते हुए जैव विविधता संरक्षण और प्रबंधन विषय के लिए निम्नलिखित उद्देष्यों की परिकल्पना की गई हैः (1) हिमालय क्षेत्र में जीन, प्रजातियों और पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षित और असंरक्षित क्षेत्रों की जैव विविधता का आकलन, मूल्यांकन, प्राथमिकता, मापन और निगरानी करना। (2) पूरे हिमालय क्षेत्र में बदलती जलवायु की स्थितियों में हिमालय की जैव विविधता की प्रतिक्रिया का मूल्यांकन करना।  (3) संवेदनशील जैव विविधता घटकों के अनुरक्षण और अधिकतम उपयोग के लिए व्यवहारों का पैकेज विकसित करना तथा स्वदेशीसमुदायों के लिए जैव संसाधन आधारित आजीविका के विकल्पों का विकास करना, (4) गुणवत्तापूर्ण पादप रोपण सामग्री की उपलब्धता सुनिष्चित करने के लिए संपूर्ण हिमालय क्षेत्र में विभिन्न कृषि जलवायु स्थलों में सजीव भंडार गृहों (संग्रहालय, हर्बल गार्डन, नर्सरी इत्यादि) की स्थापना एवं अनुरक्षण करना। (5) विभिन्न लाभार्थियों को संवेदनशील बनाना और प्रबंधन के सर्वोत्तम व्यवहारों और जैव विविधता घटकों का अधिकतम प्रयोग करने के लिए सहभागिता का निर्माण करना।

 

विषय 3: पर्यावरण  आकलन और प्रबंधन (ईएएम)

बढ़ती हुई जनसंख्या और उनकी बढ़ती मांगों दोनों ने मिलकर प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन किया है जिससे उनकी मात्रा में कमी और गिरावट आई है। उच्च मांग की तुलना में इन संसाधनों की कम आपूर्ति ने पहले से ही घटते संसाधनों पर उच्च मानवीय गतिविधि संबंधी दबाव डाला है। इसके परिणामस्वरूप अनेक प्रकार की पर्यावरण संबंधी विकृतियां पैदा हुई हैं और इन्होंने प्रदूषण को जन्म दिया। क्षेत्र के सतत विकास के लिए दिन-प्रतिदन की विकासात्मक गतिविधियों और प्रदूषण के बढ़ते दबाव पर पुनः विचार करने की जरूरत है। पर्यावरण  आकलन और प्रबंधन (ईएएम) की संकल्पना भारतीय हिमालय क्षेत्र (आईएचआर) में विभिन्न प्रकार की विकासात्मक गतिविधियों/हस्तक्षेप/ परियोजनाओं/नीतियों से संबंधित पर्यावरण के भौतिक, जैविक और सांस्कृतिक घटकों पर मुख्य रूप से केंद्रित है। इस संकल्पना का लक्ष्य प्रभावों का आकलन और विश्लेष्ण करने, प्राथमिकताओं का निर्धारण करने, अंतराल की पहचान करने, शुरू में ही न्यूनीकरण उपागम विकसित करने और सतत विकास को प्राप्त करने के लिए नई पौद्योगिकी प्राप्त करना है। इस प्रकार, ई.ए.एम. की यह संकल्पना आई.एच.आर. के सतत पारिस्थितिकी और आर्थिक विकास की योजना और प्रबंधन का प्रावधान करती है। इस संकल्पना के उद्देष्य हैं:  1. भारतीय हिमालय क्षेत्र में विभिन्न विकास हस्तक्षेपों/नीतियों/योजनाओं से संबंधित भौतिक, जैविक एवं सामाजिक-आर्थिक पर्यावरण की विशेषताओं का आकलन एवं अनुवीक्षण करना, और 2. पारिस्थितिकीय और आर्थिक वहनीयता को सुनिश्चित करने के लिए समुचित प्रबंध योजनाओं का विकास/निर्माण करना और सुझाव देना।

 

विषय 4: सामाजिक-आर्थिक विकास (एसईडी)

भारतीय हिमालय क्षेत्र (आईएचआर) जातीय समुदायों की अधिकता और विविध संस्कृतियों के शरणस्थल का एक अद्वितीय क्षेत्र है। जैव-भौतिक रूप से यह पारिस्थितिकी तंत्र बहुत समृद्ध है। लगातार बढ़ती जनसंख्या के परिमाणस्वरूप उत्पन्न गरीबी तेजी से सीमित प्राकृतिक संसाधन आधार में कमी ला रही है और स्वदेश में विकसित संसाधन उपयोग-पैटर्न को नष्ट कर रही है, जो सामाजिक रूप से स्वीकृत और सांस्कृतिक रूप से मान्यता प्राप्त थी। इसलिए, पारिस्थितिकी रूप से उपयुक्त और सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य हस्तक्षेप, नवीन आजीविका के साधनों, और स्थानीय समुदायों के कौशल में वृद्धि कर इस पारितंत्र में गरीबी में कमी लाने की आवश्यकता है जिससे उनके सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए स्थानीय संसाधनों का तर्कसंगत और विवेकपूर्ण उपयोग किया जा सकेगा। गरीबी में कमी लाकर पर्यावरण संरक्षण में वृद्धि की जा सकती है। इस दृश्य में, सामाजिक आर्थिक विकास की संकल्पना ने विकसित और सतत कृषि प्रणाली, अभिनव आजीविका विकल्प, समुदाय, स्थायी पर्यटन, उद्यमशीलताऔर स्व-रोजगार, स्वदेशीज्ञान और प्रवास और इसके सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभाव जैसी गतिविधियों की पहचान पर ध्यान केंद्रित किया है, जिसमें आईएचआर के आर्थिक रूपा से वंचित समुदायों को लाभ पहुंचाने की क्षमता है और इस प्रकार गरीबी में कमी जा सकती है। इस विषय के मुख्य उद्देष्य हैं: 1. सतत पर्यटन, हिमालय में उद्यमशीलता और स्वरोजगार, 2. स्वदेशीज्ञानः पारंपरिक जीवन शैली, वास्तुकला और स्वास्थ्य देखभाल प्रथाएं, और  3. प्रवासन : सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक निहितार्थ।

 

विषय 5: जैव प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग (बीटीए)

जैव संसाधनों के तीन प्रमुख समूहों, अर्थात पौधों, जानवरों और सूक्ष्मजीवों पर इस विषय के अंतर्गत ध्यान दिया जा रहा है। पौधे प्राथमिक उत्पाद हैं,  इसलिए उनकी उत्पादकता और कार्य प्रणाली को प्रभावित करने वाले कारकों की पूर्ण समझ, विशेष रूप से हिमालय में दुरूह गंभीर जलवायु परिस्थितियों और वैश्विक जलवायु परिवर्तन के बारे में वर्तमान चिंता बहुत महत्वपूर्ण है। पादप की अनुकूलन की विधि की समझ आवश्यक है क्योंकि यह पौधों की उत्पादकता में वृद्धि करने में सहायता प्रदान करता है। पादप-प्रसार पैकेज, स्थानीय लोगों की आवश्यकताओं की ओर ध्यान देने के लिए पारंपरिक और जैव प्रौद्योगिकी उपकरणों का उपयोग किया जा रहा है। इसके साथ ही, औषधीय और सुगंधित पौधों की पादप-रासायनिक आणविक रूपरेखा भी तैयार की  जा रही है। रिजोस्फियर सूक्ष्मजीवों के विशेष संदर्भ के साथ माइक्रोबियल विविधता पर अन्वेशण किया गया है, जिसने पहाड़ों के लिए वाहक आधारित जैव-संरोपण/बायोइनऑकुलेंट तैयार करने की पहल की है। ध्रुवीय रेगिस्तान से भूउश्मीय जल स्रोत में असहनीय पर्यावरण में रहने वाले सूक्ष्मजीवों को तापरागी/एक्सट्रीमोफाइल कहा जाता है। साइक्रोफाइल और तापरागी पादपों ने विशेष रूप से अध्ययन का ध्यान आकर्शित किया है और उनकी विविधता, जैव प्रौद्योगिकी अनुप्रयोगों और आईएचआर की चरम जलवायु परिस्थितियों में अस्तित्व अनुकूलन रणनीतियों के लिए उनका अध्ययन किया जा रहा है। विषय की परिकल्पना में: 1. आईएचआर के अनुप्रयुक्त मूल्यों की पहचान करना और जैव संसाधनों का दस्तावेज बनाना, 2. विकास की प्रक्रिया के बारे में प्रौद्योगिकीय ज्ञान का निर्माण करना,  और 3. मानव संसाधन की क्षमता का निर्माण करना शामिल है।

 

विषय 6: ज्ञान उत्पाद और क्षमता निर्माण (केसीबी)      

यह संकल्पना न केवल पारंपरिक ज्ञान के अधिकारों का संरक्षण करने की आवश्यकता पर जोर देती है, बल्कि यह परंपरागत ज्ञान प्रणालियों के आपस में जुडे सभी घटकों के संरक्षण पर भी जोर देती है। इसलिए, यह परंपरागत और आधुनिक ज्ञान का संरक्षण करने के लिए प्रविधि का विकास करने हेतु एक ढांचा भी प्रदान करता है जो आदर्श और सहित मानवाधिकार पर आधरित हैं। मानव कल्याण से संबंधित किसी भी क्षेत्र में दीर्घकाल में अर्जित, प्रलेखित और उत्पादित अथवा विकसित ज्ञान और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण को क्षमता निर्माण के प्रयासों से प्रसारित और विनियमित करने की आवश्यकता होती है जिससे सभी लाभार्थियों को सषक्त बनाया जा सके और उनकी संस्थागत और मानवीय क्षमताओं में वृद्धि की जा सके। इससे पर्यावरण संबंधी सोच और संबंधित मुद्दों को विकास नियोजन और नीति निर्माण में एकीकृत किया जा सकेगा। इस संकल्पना के उद्देश्य हैं : (क) आधुनिक ज्ञान आधार के संरक्षण और सुरक्षा के आधार के रूप में सांस्कृतिस, जैविक, भौतिक, स्थानिक, भू-परिदृश्य के साथ-साथ बौद्धिक घटकों, और उनके सतत इंटरएक्षन सहित परंपरागत और आधुनिक समाजों की ज्ञान प्रणाली का प्रलेखन और वैधीकरण के लिए गहन अध्ययन करना,  ख) विज्ञान और और प्रौद्योगिकी हस्तक्षेपों के माध्यम से स्थानीय ज्ञान और क्षमताओं  का प्रयोग करते हुए आय सृजन के लिए प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करना, (ग) जैव और प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित मौजूदा ज्ञान को उत्पाद में परिवर्तित करना, (घ) पर्यावरण संरक्षण तथा प्रबंधन और सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए ज्ञान प्रणाली की संभाव्यता का उपयोग करने में ग्रामीण और सीमांती समाजों की क्षमता और कौशल में वृद्धि करना, और (च) लाभार्थियों को एक-दूसरे और ज्ञान निर्माण/उन्नयन/उन्नयन प्रणाली पर कार्यरत संस्थानों के साथ संवाद स्थापित करने का अवसर प्रदान करने के साथ इस जटिल विषय की अनुसंधान, कार्रवाई और नीति की आवश्यकताओं का समाधान करना और विकास के लिए समुचित रणनीतियां, दिशा-निर्देश और नीति-सारांश  का विकास करने में सहायता प्रदान करना।

 

शिकायत की विधि और समय पर निपटान.....

डा. आर सी सुंद्रियाल, वैज्ञानिक-एफ, जीबीपीआईएचइडी तेजी से समस्याओं के निवारण के लिए लोक शिकायत अधिकारी के रूप में कार्य करते हैं। जनता, लोक शिकायत अधिकारी से सोमवार को दोपहर 2 से 5 बजे के बीच मिल सकती है. अपनी समस्याओं के संदर्भ में लोक शिकायत अधिकारी का ई मेल का पता है: rcsundriyal[at]gbpiged[dot]nic[dot[in]

 

लोक शिकायत अधिकारी:     

डा. आर सी सुंद्रियाल, वैज्ञानिक-एफ

गोविन्द बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण एवं सतत विकास संस्थान विकास

कोसी-कटारमल, अल्मोड़ा-263643, उत्तराखंड, भारत

फोनः (05962) 241041/241154, फैक्सः: (05962) 241014/241150

ईमेलः rcsundriyal[at]gbpiged[dot]nic[dot[in]

 

अपीलीय प्राधिकार:

निदेशक

गोविन्द बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण एवं सतत विकास संस्थान

कोसी-कटारमल, अल्मोड़ा-263643, उत्तराखंड, भारत

फोनः (05962) 241041/241154, फैक्सः: (05962) 241014/241150

ईमेलः psdir[at]gbpiged[dot]nic[dot[in]

 

जहॉं तक जनता की शिकायतों को सुनने का प्रश्न है, शिकायत का उत्तर शिकायतकर्ता को एक सप्ताह के भीतर भेज दिया जाएगा। इसके साथ ही जीबीपीआईएचईडी द्वारा प्राप्त शिकायत का समाधान इसके प्राप्त होने के तीन महीने के भीतर कर दिया जाएगा।

 

जीबीपीएनआईएचईएसडी के संपर्क के पते और फोन न. इस प्रकार हैं.....

मुख्यालय

 

निदेशक

गोविन्द बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण एवं सतत विकास संस्थान

(पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार का स्वायत्तशासी संस्थान)

कोसी-कटारमल, अल्मोड़ा-263643, उत्तराखंड, भारत

फोन नः 05962-241041,/241154, फैक्सः 05962-241014/241154

ई मेल: psdir[at]gbpihed[dot]nic[dot]in, URL: http://gbpihed.gov.in

माउंटेन डिवीजन (संस्थान की 5 वीं इकाई)
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय,

इंदिरा पर्यावरण भवन, जोर बाग रोड, नई दिल्ली - 110 003, भारत

ई मेल: kireet[at]gbpihed[dot]nic[dot]in

हिमाचल इकाई 

प्रभारी वैज्ञानिक

जीबीपीएनआईएचईएसडी एचपी इकाई

मोहल, कुल्लू-175126

हिमाचल प्रदेश, भारत

फोनः (01902) 225329

फैक्सः (01902) 222720

ईमेलः hpunit[at]gbpihed[dot]nic[dot]in,

samantss2[at]rediffmail.com

गढ़वाल इकाई

प्रभारी वैज्ञानिक

जीबीपीएनआईएचईएसडी गढ़वाल इकाई

उपरी भक्तीयान, श्रीनगर

गढ़वाल-246174 (उत्तराखंड)

फोनः (01346) 252403

फैक्सः (01346) 252424

ईमेलः garhwalunit[at]gbpihed[dot]nic[dot]in, 

rkmaikhuri[at]rediffmail.com

सिक्किम इकाई 

प्रभारी वैज्ञानिक

जीबीपीएनआईएचईएसडी सिक्किम इकाई

पांग्थांग पी ओ पेंलोंग पूर्व

सिक्किम 737101 सिक्किम भारत

फोनः (03592) 237328

फैक्सः (03592) 237415

ईमेलः ईमेलः sikkimunit[at]gbpihed[dot]nic[dot]in,

पूर्वोत्तर इकाई

प्रभारी वैज्ञानिक

जीबीपीएनआईएचईएसडी एनई इकाई

विवेक विहार, ईटानगर 791113

अरुणांचल प्रदेश, भारत

फोनः (0360) 2211773

फैक्सः (0360) 2211773

ईमेलः ईमेलः neunit[at]gbpihed[dot]nic[dot]in,

 

इसके साथ ही हमारी सेवाओं में सुधार और जनता की प्रतिक्रिया के लिए सिटीजन चार्टर की समय-समय पर समीक्षा की जाएगी।