अनुसंधान एवं विकास गतिविधियां: इन हाउस परियोजनाएं

(वैज्ञानिक सलाहकार समिति द्वारा अनुमोदित)

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गोविंद बल्लभ पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान

(पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार का स्वायत्तशासी संस्थान)

कोसी-कटारमल, अल्मोड़ा-263643, भारत

 

 

 

 

 

1. अनुसंधान और विकास विषयक श्रेणियाँ .....

    

    संस्थान के अनुसंधान और विकास कार्यक्रमों को हितधारकों की आवश्यकताओं के आधार पर तीन कार्य समूहों और छह विषयगत क्षेत्रों में पुनर्भिविन्यासित किया गया हैः

समूह-1

 समूह-2

समूह-3

 

2. संस्थान की अनुसंधान एवं विकास परियोजनाएं: (2012-2017)......   

 

समूह - 1 (एसईडी और ईएएम) परियोजनाएं

 

 

परियोजना 1 : पर्यावरण पर्यटन भारतीय हिमालय क्षेत्र में जैव विविधता के संरक्षण और टिकाऊ आजीविका के लिए एक संभावित साधन के रूप में

 

सारांश

भारतीय हिमालय क्षेत्र जैविक और सांस्कृतिक रूप से देष में सबसे समृद्ध क्षेत्रों में से एक है। आईएचआर विभिन्न प्रकार के पर्यटन के विकास के लिए पर्याप्त अवसर प्रदान करता है। इनमें प्रकृति आधारित (अल्पाइन के फूय, पक्षी देखना,  टाउट मछली पकड़ना), साहसिक (ट्रेकिंग राफ्टिंग, पर्वतारोहण ग्लाइड़िग), सांस्कृतिक पर्यटन (त्यौहार, खाद्य त्योहार, मंदिर मठ), अवकाश पर्यटन (स्थलों का भ्रमण, रोपवे), कृषि पर्यटन (जैसे खेतों में मछली पकड़ना), अरुणाचल प्रदेश  में प्रसिद्ध अपातनी चावल-व-मछली के खेत और विशेष अवसर उत्सव (हिमाचल प्रदेश  और उत्तराखंड में दशहरा उत्सव) आदि के लिए अपार अवसर प्रदान करता है. पर्यटन, इस क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता के संरक्षण और जातीय समुदायों के आर्थिक विकास के लिए पर्याप्त क्षमता प्रदान करता है। यह एक तरफ आजीविका का विकास करने के लिए पारि-पर्यटन को एक संभावित तंत्र के रूप में अर्थव्यवस्था, संस्कृति और समुदाय संरक्षित क्षेत्रों (सीसीए)/समुदाय वनों पारिस्थितिकी मॉडल का विकास, अर्थव्यवस्था के साथ पर्यटन को शामिल करने और विकसित करने पर जोर देती है, दूसरी तरफ क्षेत्र में वनों और जैव विविधता के संरक्षण को प्रोत्साहन प्रदान करती है। हिमालय क्षेत्र में चयनित पारितंत्र साइटों की स्थिति, पारि-पारिस्थितिकी की आर्थिक प्रासंगिकता और लोगों और पर्यावरण पर पर्यटन के प्रभाव का विश्लेषण परियोजना के कार्यकाल के दौरान किया जाएगा।

 

उद्देश्य

 

परियोजना 2 : भारतीय हिमालय क्षेत्र में पनबिजली परियोजनाओं का सामरिक पर्यावरण मूल्यांकन सारांश  

 

सारांश

वर्तमान प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य सामरिक पर्यावरण मूल्यांकन के लिए विभिन्न श्रेणियों की परियोजनाओं की पहचान करना है, जो कार्यान्वयन, निर्माण के चरणों में और प्रस्तावित हैं। इस तरह की परियोजनाओं ने पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन के माध्यम से स्वीकृति प्राप्त की है। तथापि सिद्धांत रूप में इन परियोजनाओं ने ईआईए को एक प्रमुख उपकरण के रूप में अपनाकर स्वीकृति प्राप्त की है, जो एक के बाद एक परियोजना को जलग्रहण स्थल के भीतर एक दूसरे के साथ अपनी व्यक्तिगत पारिस्थितिक सीमाओं पर विचार किए बिना अनुमति प्रदान करता है। इससे एक परियोजना का दूसरी परियोजना के साथ अतिव्यापन हुआ है। इससे न केवल उनके तत्काल आसपास के भीतर, बल्कि उनके ऊपरी और निचले ढ़लान के क्षेत्रों में भी पर्यावरण की समस्या उत्पन्न हुई है। ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम और रिमोट सेंसिंग और भौगोलिक सूचना प्रणाली की मदद से एक जलग्रहण पर इन परियोजनाओं के स्थल की पहचान की जाएगी, जिसके बाद इन परियोजनाओं के ऊपरी और निचले ढ़लान का संचयी आकलन एसईए द्वारा किया जाएगा, जिससे एक जलग्रहण क्षेत्र में उनकी सही-सही संख्या प्राप्त की जा सकेगी। तेज गति से ग्लेशियर पिघलने के रूप में जलवायु परिवर्तन की घटना से जीवित नदियों में अनियमित और कभी-कभी सीमित जल उपलब्धता के व्यवहार के रूप में इन परियोजनाओं के लिए अनेक चुनौतियां उत्पन्न कर रही है। ग्लेशियर पिघलने के कारण, चयनित जल विद्युत परियोजनाओं के वार्षिक जल प्रवाह का आकलन नीति निहितार्थ के साथ इन परियोजनाओं को मजबूत करने के लिए एक व्यापक मूल्यांकन प्रदान करेगा।

 

उद्देश्य

 

परियोजना 3 : भारत के हिमालय क्षेत्र में पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

 

सारांश

वैश्विक जलवायु परिवर्तन के परिदृश्य के तहत पर्वतीय क्षेत्र सबसे ज्यादा संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में उभरा है। विश्व के पहाड़ों में हिमालय क्षेत्र अपनी अनूठी स्थलाकृति, सूक्ष्म जलवायु परिस्थितियों और रणनीतिक स्थान के कारण सबसे प्रमुख है और यह वैश्विक जैव विविधता का प्रतिनिधित्व करता है। इस क्षेत्र में सीमित वितरण के साथ स्थानिक वनस्पति और जीव की समृद्धि और जीवन समर्थन मूल्य पारिस्थितिकी तंत्र की वस्तुएं और सेवाएं  सामान्य रूप में वैश्विक समुदाय और विशेष रूप से क्षेत्रीय निवासियों के लिए अत्यधिक मूल्यवान है। तथापि, हाल के दशकों में बदलते हुए मौसम परिदृश्य के तहत पारिस्थितिकी तंत्र की वस्तुएं और सेवाए जैसे स्थानीय, आजीविका, जैव विविधता के लिए वास प्रावधानीकरण,  वनस्पति मिट्टी, पूल में वर्षा जल का संग्रहण और क्षेत्र से उत्पन्न होने वाली नदियों में जल प्रवाह का नियमन, सी-चरणबद्धता क्षमता और सांस्कृतिक मूल्य आदि की स्थिति बदतर हुई है। ऊपर की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए वर्तमान प्रस्ताव को तैयार किया गया है जिसके अंतर्गत पश्चिमी हिमालय क्षेत्र की प्रमुख वन पारिस्थितिकी प्रणालियों पर ऊंचाई ढाल (तापमान विविधताओं) में व्यवस्थित अध्ययन शुरू किया जाएगा और इससे जीवन चक्र के चरण (फीनोफेज) की आवृति जैसे विकास प्रारंभन, पादप टैक्सा, पुनर्जनन, पुष्पन और मौसम की प्रवृति तथा सीसी के साथ इन घटनाओं का समय से सबंद्धता का अनुवीक्षण किया जाएगा। इसके कुछ क्रियात्मक पहलुओं अर्थात बायोमास उत्पादकता और कूडा अपघटन आदि का अध्ययन चिह्नित वन पारिस्थितिकी प्रणालियों में किया जाएगा। इस प्रकार एकत्र आंकड़े की वन पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं और ई.एस. के परिमाण में संभावित गिरावट के संदर्भ में अध्ययन किया जाएगा।

    भारतीय हिमालय क्षेत्र में वनों पर निरंतर जैविक दबाव के कारण कई क्षेत्र अपशिष्ट/परती  भूमि में बदल गए हैं क्योंकि यह स्थानीय लोगों के लिए शायद ही कोई उपयोगी वनस्पति पैदा कर सकती है। अतीत में जीबीपीआईएचईडी द्वारा कुछ प्रायोगिक स्थलों पर इस तरह के अपशिष्ट/परती भूमि के पुनर्वास को क्षेत्र के ग्रामीण समुदायों के बीच पदर्शित किया गया। वर्तमान परियोजना में बदलती जलवायु परिस्थितियों के परिदृश्य में लगाए गये पड़ों और झाड़ियों में परिवर्तन की लंबे समय तक निगरानी की जरूरत वाले इस तरह के पुराने स्थलों को विशेष रूप से उनके कुछ ई.एस. जैसे चारा, ईंधन, मिट्टी, और जल संरक्षण आदि प्रदान करने की संभवाना के संदर्भ में उन्हें मजबूत किया जाएगा और उनकी जांच की जाएगी। इसके अलावा, क्षेत्र के निवासियों द्वारा नियोजित सीसी के दुष्प्रभावों से निपटने के लिए अनुकूलन उपायों को भी प्रलेखित किया जाएगा। वन परिदृश्य के सौंदर्य और सांस्कृतिक पहलुओं पर सीसी के प्रभाव को भी अध्ययन क्षेत्र में ईएस को अधिकतम करने के लिए पारिस्थितिकी प्रणालियों के संरक्षण की दीर्घकालिक योजना के लिए अनुपूरक और समझ में सुधार करने के लिए उपयोग किया जाएगा।

    मनुष्य अपने अस्तित्व के लिए अनेक पारिस्थितिकी तंत्र वस्तुओं और सेवाओं विशेष रूप से वन, कृषि, जलीय और पारिस्थितिकी प्रणालियों पर निर्भर करता है। पारिस्थितिकी तंत्र की सेवाएं पदार्थ और ऊर्जा के सार्वभौंमिक बलों के माध्यम से एक पारिस्थितिकी तंत्र के जैविक और अजैविक घटकों के बीच आदान-प्रदान के परिणाम स्वरूप उत्पन्न होती है। बायोमास उत्पादकता ईएस उत्पन्न करते है लेकिन हमेशा यह जरूरी नहीं है कि वे परस्पर सदृश्य हो। इस तरह ईएस वर्ष में कई खरब डालर अर्जित करते है।

 

उद्देश्य

समूह - 2 (डब्ल्यूपीएम और केसीब) परियोजनाएं

 

 

परियोजना - 4 : भारतीय हिमालय क्षेत्र में बदलते जल संसाधन परिदृश्य का पारिस्थितिकीय,  सामाजिक और नीति संबंधी निहितार्थ

 

सारांश                                                                                                       पानी पर्यावरण का एक मौंलिक घटक और पृथ्वी पर सभी प्रकार के जीवन के लिए महत्वपूर्ण वस्तु होने के कारण जल संसाधनों की संवेदनशीलता, पहाड़ की पारिस्थितिकी तंत्र और मानव समाज के स्वास्थ्य के लिए दीर्घकालिक महत्व है। जल तनाव और स्थिरता उपलब्ध जल संसाधन के प्रकार्य और उनकी खपत और निकासी है। संसाधन और खपत दोनों परिवर्तनशील हैं जो पारिस्थितिकी तंत्र, कृषि बुनियादी ढांचे, प्रौद्योगिकी, जनसांख्यिकी और अर्थव्यवस्था के रूप में कई कारकों पर निर्भर करती है। इसके अतिरिक्त, जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न अनिश्चितता से कुछ दशकों के भीतर पानी की आपूर्ति में भारी गिरावट होने की संभावना है। गैर हिमनद के जलग्रहण में शुष्क मौसम के प्रवाह में गिरावट, बहाव के कई क्षेत्रों को प्रभावित करेगा. विशेष रूप से, मसौदा राष्ट्रीय जल नीति 2012 में पानी के संकट को हल करने के लिए नदी बेसिन के अध्ययन पर दिए जा रहे वर्तमान जोर पर विचार को ध्यान में रखते हुए हिमालय पर्वत में पारिस्थितिकी तंत्र घटकों और समाज पर जल संसाधन परिदृश्य के बदलते प्रभाव का अध्ययन महत्वपूर्ण है। क्षेत्र में आबादी बढ़ रही है और फलस्वरूप पानी की मांग भी बढ़ रही है और गांवो से शहरी बस्तियों में लोगों के पलायन से स्थिति और भी जटिल हो गई है। इसके अलावा,  आर्थिक विकास और वर्तमान जीव स्तर पानी की मांग को बढ़ा रही है। ये सभी मुद्दे जल प्रबंधकों के लिए चुनौतियां खड़ी कर हरे हैं। ऊपरी कोसी बेसिन में किया गया एक अध्ययन दर्शाता है कि विभिन्न सामाजिक आर्थिक परिदृश्य के तहत अगले 18 वर्ष में पानी की मांग में 45 से 854 प्रतिशत वृद्धि होगी। अधिकांश क्षेत्रों से आपूर्ति की तुलना में पानी की मांग अधिक है। यह देखने में आया है कि मांग की तुलना में परिवर्तन प्रायः आपूर्ति की तुलना में अधिक होता है। इसलिए जल संसाधनों का आकलन करने के लिए मांग/पूर्ति के दानों पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखने की जरूरत है।

    क्षेत्रीय पैमाने पर घरेलू जल सुरक्षा को बढ़ावा देना, जलवायु परिवर्तन के खतरों के लिए अनुकूल प्रबंधन करना जल प्रबंधन की प्रस्तावित प्राथमिकता रही है। दुर्भाग्य से जल के क्षेत्र में इन परिवर्तनों को समझने का प्रयास और पारिस्थितिकी तंत्र के गुणों और मानव समाज पर इसके परिणाम विशेष रूप से हिमालय के संदर्भ में आंकड़ा की कमी के कारण विखंडित रहे हैं। इसके अलावा, आईएचआर में पानी के संसाधनों को बढ़ाने और प्रबंधन के लिए कार्यरत एस एंड टी आदानों, नीतियों और संस्थागत ढांचे के औचित्य और पर्याप्तता पर अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। उभरती अर्थव्यवस्थाओं और सीमित संसाधन की उपलब्धता के साथ पानी की कमी के जोखिम को कम करने की आवश्यकता को केवल कठिन इंजीनियरिंग समाधान द्वारा ही संबोधित नहीं किया जा सकता। वित्तीय संसाधनों की पर्याप्तता के बिना और क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी पर विचार करते हुए एक संवेदनेशील विकल्प यथासंभव पारिस्थितिकी तंत्र आधारित समाधान को लागू करना है। यह माध्यम अवधि के जोखिम को कम करेगा। उपर्युक्त को ध्यान में रखते हुए स्वाट और वीप की तरह के जल विज्ञान और जल प्रबंधन मॉडल पर ध्यान केंद्रित दृष्टिकोण के माध्यम से इस परियोजना को शुरू करने का प्रस्ताव है। जल प्रबंधन योजना में पारिस्थितिकी तंत्र घटकों के लिए प्रावधान के साथ मांग और आपूर्ति पक्ष के प्रबंधन को एकीकृत करने के प्रयास किए जाएंगे। इसके मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं: परिवर्तनशील जलवायु की पारिस्थितियों में जल संसाधन परिदृश्य में परिवर्तन को प्रदर्शित करने वाले संभावित सूचकों की पहचान, विश्लेषण और आकलन करना और वाटरशेड स्केल पर उपभोग और गैर उपभोग पर इसका इंटरएक्शन। सतह के पानी के बदलते प्रभाव की जांच करना और परिवर्तन के लिए नाजुक महत्वपूर्ण अतिसंवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र के घटकों को प्रदर्शित करना, समाज पर बदलते जल संसाधनों के परिणामों का विश्लेषण और स्थानीय और नीति के स्तर पर कार्यरत उपायों का अनुकूलन और हिमालय पर्वत के संदर्भ में ऊपर पहचानी गई चुनौतियों के समाधान के लिए अनुकूल जल प्रबंधन कार्य योजना विकसित करना।

 

उद्देश्य       

 

परियोजना 5: ग्रामीण प्रोद्द्योगिकी परिसर (आरटीसी) के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों के प्रयोग और प्रबंधन के लिए स्वदेशी पर्वतीय समुदायों की क्षमता का निर्माण

 

सारांश
भारतीय हिमालय पर्वत विश्व में सबसे नाजुक और जटिल पारिस्थितिकी तंत्र में से एक है। पहाड़ी ऋंखला में अधिकतर जनसंख्या कृषि और संबंधित गतिविधियों में लगी हुई है। जिससे वे न तो आर्थिक अधिशेष अर्जित कर पाते है और न ही कृषि के अलावा अन्य रोजगार के अवसर ढूंढ पाते हैं। कुल श्रमिकों में लगभग 70 प्रतिशत से  85 प्रतिशत से अधिक महिला श्रमिक भूमि आधारित या कृषि गतिविधियों में शामिल हैं। पहाड़ के लोगों को अनेक प्रकार की आर्थिक और पर्यावरण संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। वे पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील और आर्थिक रूप से विवश परिस्थितियों में भौगोलिक अलगाव में रहते हैं। इसलिए स्थानीय रूप से उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण संरक्षण के कुशल प्रबंधन के माध्यम से आजीविका सुरक्षा और स्थायी खाद्य उत्पादन प्राप्त करना हमेशा ही पहाड़ों के संदर्भ में चुनौतीपूर्ण रहा है। ये सभी परिस्थितियां पहाड़ के लोगों विशेष रूप से ग्रामीण युवाओं को देश के अन्य भागों में आजीविका के अन्य विकल्पों के लिए पलयान करने के लिए मजबूर करते हैं।

    हिमालय क्षेत्र की स्थिरता इसके निवासियों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए वनों के विनाश के कारण चिंताजनक बनी हुई है। भूमि क्षरण, वनों की कटाई, प्राकृतिक संसाधान में गिरावट और बढ़ती गरीबी इन क्षेत्रों के लिए मुख्य मुदृदे हैं। और इसने न केवल पहाड़ के लोगों की आजीविका के लिए खतरा पैदा किया है, बल्कि इससे सटे भारतीय गंगा के मैदानी इलाकों में रहने वाले लोगों को भी प्रभावित किया है। मौजूदा स्थिति में सुधार करने के लिए लक्ष्य समूह हेतु स्थल प्रशिक्षण, जागरूकता और क्षमता निर्माण के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकी और प्रथाओं की बड़े पैमाने पर प्रदर्शन की तत्काल आवश्यकता है। जीवन सहायता प्रणाली में प्रौद्योगिकी में ऐसे अनेक व्यापक क्षेत्र हैं जिनमें सुधार/हस्तक्षेप, उत्पादकता में सुधार, महिलाओं और पुरुषो के लिए कठिन परिश्रम में कमी, स्थानीय जैव संसाधन, बायोप्रोस्पेक्टिंग और आजीविका के विकल्प के लिए प्रावधान की आवश्यकता है। प्रस्तावित अध्ययन का लक्ष्य पर्यावरण संरक्षण के साथ मिलकर प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन के माध्यम से सतत विकास और आजीविका सुरक्षा प्राप्त करना है।

    प्रस्ताविता गतिविधियों से प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के लिए एक संसाधन संरक्षण और टिकाऊ उपयोग मॉडल विकसित करने की आशा की जाती है। इसके अलावा, क्षमता निर्माण और वर्ष भर रोजगार के अवसर सकारात्मक रूप से हितधारकों को प्रभावित करेंगे। भोजन, पोषण, ऊर्जा और पर्यावरण की सुरक्षा के साथ आजीविका सुरक्षा की प्राप्ति सतत आधार पर जीवन की बेहतर गुणवत्ता को सुनिश्चित करेगी। इसे वैज्ञानिक उपायों, मानव संसाधन के कौशल विकास और स्थानीय संस्थाओं का सुदृढ़ीकरण से प्राप्त किया जाएगा। इस परियोजना के मुख्य उद्देश्य होंगेः स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों के आधार पर विभिन्न पहाड़ी विशिष्ट कम लागत के प्रौद्योगिकीय उपाय उपलब्ध करवाना, प्रशिक्षण/प्रत्यक्ष प्रदर्शन से क्षेत्र में प्रयोग द्वारा हितधारकों की क्षमता का निर्माण करना और नियमित आधार पर प्रशिक्षकों को प्रशिक्षण देना और हितधारकों के लिए प्रौद्योगिकी पैकेज के क्षेत्र के कार्यान्वयन के लिए मार्गदर्शन और सहायता प्रदान करना और तत्पश्चात इनकी निगरानी, मूल्यांकन, बाद में अनुग्रहण, दीर्घकालिक हस्तक्षेप/सहायता से वित्तीय व्यवहार्यता स्थापित करना, अनेक आजीविका के विकल्पों को विकसित करना और ग्रामीणों के जीवन की गुणवता में आजीवीका सुरक्षा और समग्र सुधार प्राप्त करना और प्रौद्योगिकी निर्माताओं और वास्तविक उपयोगकर्ताओं के बीच संपर्क के रूप में कार्य करना।

 

उद्देश्य            

 

परियोजना 6 : कृषि प्रणालियां और बदलती जलवायु की स्थितिः हिमालय में खाद्य और पोषण सुरक्षा का  सुदृढ़ीकरण

 

सारांश                       

भारतीय हिमालय क्षेत्र (आईएचआर) एक विशिष्ट और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील भौगोलिक क्षेत्र है जहां की लगभग 70 प्रतिशत आबादी ग्रामीण है और मुख्य रूप से वर्षा आधारित कृषि, बागवानी और पशुपालन पर निर्भर है। यहॉं की खेती प्रणाली जटिल है, फसलें पशु पालन और वन यहॉं की उत्पादन प्रणाली रखते हैं। हिमालय में पर्यावरण, जैविक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक विविधताओं ने विविध और अद्धितीय खेती प्रणाली, फसल प्रजातियों और पशुधन के विकास का मार्ग प्रशस्त किया है और इसने यहां के समुदायों को बनाए रखने में मदद की है। क्षेत्र की खेती प्रणाली तेजी से नवीन प्रौद्योगिकी, बाजार अर्थव्यवस्था और कृषितर आर्थिक विकल्पों से प्रभावित है। जलवायु परिवर्तन और कृषि आपस में जुड़े हुए हैं और जलवायु परिवर्तन अनके कारको में से एक है जो खाद्य उत्पादन प्रणालियों को प्रभावित कर रहा है। खाद्य फसलों के फेना-फेज जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हैं। फसल चरणों में बदलाव, रोपण परिपक्वता फसल के साथ कीट-गतिविधि द्वारा कृड्षि को प्रभावित करते हैं।

    आईएचआर में किसानों ने पहाड़ियों के कठोर वातावरण से निपटने के लिए स्थानीय स्तर पर उपयुक्त पद्धतियां विकसित की हैं। इन पद्धतियों को लगातार स्थानीय वातावरण, बदलते और नई मांगों को पूरा करने के लिए उन्नत किया जाता है। फसल की नई किस्मों को अपनाया जा रहा है। वैश्विक जलवायु परिवर्तन पर जानकारी उपलब्ध है लेकिन उत्तराखंड के कुमाऊ और गढ़वाल क्षेत्रों से जलवायु परिवर्तन के अंतर्गत कृषि व्यवस्था में अनुकलन उपायों/प्रथाओं पर प्रकाशित जानकारी की काफी हद तक कमी है।

 

उद्देश्य

 

समूह - 3 (बीसीएम व बीटीए) परियोजनाएं

 

परियोजना 7 : भारतीय हिमालय क्षेत्र में संसाधनों के बदलते उपयोग और जलवायु परिदृश्य के तहत जैव विविधता पैटर्न और प्रक्रियाओं को समझना : पारिस्थितिकी और सामाजिक प्रभाव

 

सारांश
हिमालय क्षेत्र वैश्विक जैव विविधता के 34 प्रमुख स्थलों में से एक है। भारतीय हिमालय क्षेत्र (आईएचआर) अपनी अनूठी स्थलाकृति, जलवायु की परिस्थितियों, विविध निवास और उच्च ऊचाई पर्वतमाला ऋंखला के साथ इस हाटस्पाट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस क्षेत्र की जैव विविधता तेजी से बदलते पर्यावरण की स्थिति के साथ मिलकर विभिन्न मानवीय गतिविधियों की वजह से नष्ट हो रही है। वहीं क्षेत्र में प्रचलित विभिन्न पारिस्थितिकी तंत्र उनकी उपयोगिता, संस्कृति विनियमन और सहायता सेवा (सीसी) को ऊपरी और निचले भागों में रहने वाले निवासियों के लिए उपयोगिता हासिल करती जा रही है। जलवायु परिवर्तन को पारिस्थिकी तंत्र और स्थानीय लोगों के भविष्य को आकार देने में सबसे महत्वपूर्ण कारक के रूप में मान्यता प्राप्त है। भविष्य के परिवर्तन की भविष्यवाणी के साथ क्षेत्र में बनावट, संरचना और जैव विविधता पर परिवर्तन के संभावित प्रभावों की गहनता और दिशा को समझने की आवश्यकता को तुरंत महसूस किया गया है। इसके आवाला, शीतोष्ण, उप-अल्पाइन और अल्पाइन क्षेत्रों के जैव विविधता घटक मानवीय गतिविधियों से गंभीर रूप से प्रभावित हैं। सभी कारक आईएचआर की जैव विविधता को कमजोर बनाते हैं, जो विविध पारिस्थितिकी प्रणालियों भू-परिदृष्यों के मूल्यांकन, स्थिति, बदलते परिवर्तन और प्रक्रियाओं और संरक्षण तथा दोहन सामाजिक-आर्थिक मूल्यों का उपयोग करने के लिए आदान उपलब्ध कराने, पारिस्थतिक अखंडता, स्थिरता और प्रतिनिधि पारिस्थितिकी प्रणालियों और उनके घटकों के लचीलापन का मूल्यांकन और तुलना करने, जैव विविधता घटकों पर जलवायु और संसाधन के उपयोग के परिवर्तन के प्रभावों का विश्लेषण करने, और इसके सामाजिक आर्थिक परिणामों का आकलन करने के लिए तत्काल कार्रवाई करने की आवश्यकता है जिससे बदलती जलवायु और भू-प्रयोग के तहत इसकी जैव विविधता के संरक्षण और स्थायी उपयोग के लिए यथार्थवादी और व्यापक रूप से स्वीकार्य कार्रवाई एजेंडे को तैयार किया जा सके। उपर्युक्त को ध्यान में रखते हुए और विविध परिवर्तन करने के लिए जैव विविधता और इसकी संवेदनशीलता के महत्व को ध्यान में रखते हुए और इस अध्ययन में विभिन्न जीव भौगोलिक क्षेत्रों में भारतीय हिमालय के प्रतिनिधि अल्पाइन शीतोष्ण, उप-अल्पाइन को शामिल करने का प्रस्ताव किया गया है जिससे अध्ययन और उसके परिणाम को व्यापक रूप से स्वीकार्य और विश्व स्तर पर प्रासंगिक बनाया जा सके। सूचना के निर्बाध प्रवाह, को सुनिश्चित करने के लिए लंबे समय तक निगरानी साइटों की स्थापना, सबसे अधिक लचीले निवास की पहचान और हिमालय जैव विविधता और जलवायु परिवर्तन नॉलेज नेटवर्क की पहचान अध्ययन के प्रमुख परिणामों में हैं।

 

उद्देश्य

 

परियोजना 8 : जैव प्रौद्योगिकी और भौतिक दृष्टिकोण का उपयोग कर हिमालय जैव विविधता तत्वों के संरक्षण और सतत उपयोग को बढ़ावा देना।

 

सारांश      

निवासियों के पर्यावरण संतुलन और सामाजिक आर्थिक विकास को बनाए रखने के लिए जैव विविधता के पारिस्थितिकी और आर्थिक महत्व को दुनिया भर में महसूस किया गया है। कम से कम विश्व की 40 प्रतिशत अर्थव्यवस्था और गरीब लोगों की जरूरत का 80 प्रतिशत जैविक संसाधनों से वंचित हैं। दुनिया के पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र में, हिमालय की पारिस्थितिकी प्रणालियों का विशेष महत्च है क्योंकि प्रतिनिधि, प्राकृतिक, अद्धितीय और भारतीय हिमालय क्षेत्र में उष्णकटिबंध तंत्र का प्रतिनिधित्व ही इसके उच्च संरक्षण और सामाजिक-आर्थिक मूल्यों को दर्शाता है. आईएचआर के निवासी काफी हद तक अपनी जीविका के लिए जैविक संसाधनों पर निर्भर करते हैं। लेकिन बदलते पर्यावरण की स्थिति के साथ उच्च मानवीय दबाव ने जैव विविधता की पारिस्थितिकी और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण तत्वों को तेजी से नष्ट किया है। भारतीय पौधों की रेड डाटा पुस्तक में  संवहनी पौधों की प्रजातियों की सूची और अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ की विभिन्न खतरा श्रेणियों के तहत औषधीय पौधों की सूची जैव विविधता की तेजी से कमी को साबित करता है। आवासों और समग्र पर्यावरण संरक्षण के लिए जैव विविधता के महत्व को महसूस करते हुए स्थानीय, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास में काफी वृद्धि हुई है और सतत विकास के लिए विभिन्न स्तरों पर व्यावहारिक रणनीति तैयार करने के लिए पारिस्थितिकीविद और अर्थशास़्त्री दोनों की चिंताओं पर एक साथ विचार किया जा रहा है।  

    इसलिए, परिणामस्वरूप जैव विविधता संरक्षण और क्षेत्र के समग्र विकास के लिए इसका उपयोग राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्राथमिकताओं के रूप में उभरा है। अब तक किए गए अध्ययन में जहाँ वनस्पतियों, पारिस्थितिकी, मानव-वनस्पति, जन्म स्थान और स्थानिकता पर ध्यान केंद्रित किया गया है और दूसरी ओर अध्ययनों की सीमित संख्या में जनसंख्या आकलन और बाद में विकासशील प्रचार, जैव प्रौद्योगिकी और परंपरागत और खेती संकुल पर ध्यान केंद्रित किया गया है. पारिस्थितिकी और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण पौधों, स्व-स्थानिक बादृय-स्थानिक कृषि तकनीक संरक्षण सहित विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों में तनाव के तहत पादप अनुकूलन के भौतिक और जैव रासायनिक आधार पर अध्ययन न केवल बुनियादी तंत्र को समझने बल्कि उपर्युक्त अध्ययन की सहायता के लिए भी आवश्यक होगा। विभिन्न आबादी की पादपरासायनिक और आनुवंशिक विविधता की जांच का कुलीन आबादी क्लोन की स्क्रीनिंग के लिए विचार किया गया है। उपर्युक्त अध्ययनों का संयुक्त परिणाम निवासियों के बीच जागरूकता को बढ़ावा देने में सहायक सिद्ध होगा। इसलिए वर्तमान अध्ययन को जैव विविधता तत्व के संरक्षण और स्थायी उपयोग के लिए योगदान देने और राष्ट्रीय और स्थानीया और अंतरराष्ट्रीय स्तर के साथ डेटाबेस को जोड़ने सहित हिमालय क्षेत्र में उपरोक्त मुद्दों का समाधान करने के लिए प्रस्तावित किया गया।

 

उद्देश्य

 

परियोजना 9 : हिमालय के एक्स्ट्रीमोफाइलः पर्यावरण लचीलापन और जैव प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग

 

सारांश                                                                 

संस्थान की माइक्रोबायोलॉजी प्रयोगशाला ने पिछले दो दशकों में भारतीय हिमालय क्षेत्र की विभिन्न सूक्ष्मजीवविज्ञानी अनुसंधान पहलुओं पर पहल की एक विस्तृत ऋंखला तैयार की है। इन अध्ययनों का फोकस अलगाव, लक्षण और संबंधित अनुप्रयोगों पर रहा है। एक्स्ट्रीमोफाइल सहित उच्च ऊंचाई की मइक्रोबियल संस्कृति संग्रह पिछले कुछ वर्ष में प्रयोगशाला में विकसित की गयी है। इन अध्ययनों का पूरक एक महत्वपूर्ण मुद्दा है जिस पर ध्यान देने की जरूरत है, वह है - सूक्ष्म जीवाणुओं के साथ पारिस्थितिकी लचीलापन। इसके अलावा चरम मौसम के तहत की गयी माइक्रोबियल गतिविधियों का पर्यावरण के साथ ही साथ जैव प्रौद्योगिकी महत्व में भी अनुप्रयोग है। वर्तमान प्रस्ताव इस प्रकार एक्स्ट्रीमोफाइल के जैव प्रौद्योगिकी अनुप्रयोगों और पारिस्थितिक लचीलेपन के विशेष संदर्भ में उनके लक्षण वर्णन पर विचार करने के मुद्दों पर काम करने के लिए तैयार किया गया है।

    चयनित संस्कृतियां जिनको उपयुक्त जैव आकूलेट के रूप में स्थापित किया गया है, उनका प्रयोग (1) बेहतर पादप स्वास्थ्य, और (2) संदूषित स्थलों पर भारी धातु के भार को कम करने (कुल्लू और सिक्किम इकाई सहयोग से) के विषेश संदर्भ में प्रयोग में लाया जाएगा।

 

उद्देश्य