गोविंद बल्लभ पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान

(पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार का स्वायत्तशासी संस्थान)

कोसी-कटारमल, अल्मोड़ा-263643, भारत

 

 

 

 

 

संस्थान के बारे में......

जी.बी. पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान (जीबीपीआईएचईडी) की स्थापना 1988-89 में भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत के जन्म शताब्दी वर्ष के दौरान पर्यावरण और वन मंत्रालय, भारत सरकार के एक स्वायत्त संस्थान के रूप में की गई है जिसकी पहचान वैज्ञानिक ज्ञान को उन्नत करने, एकीकृत प्रबंधन रणनीति तैयार करने, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए अपनी क्षमता का प्रदर्शन करने और संपूर्ण भारतीय हिमालय क्षेत्र (आईएचआर) में पर्यावरण की दृष्टि से ठोस विकास सुनिश्चित करने के लिए एक केंद्रीय एजेंसी के रूप में की गई है। यह संस्थान सामाजिक, पारिस्थितिक, आर्थिक और भौतिक प्रणालियों के बीच के जटिल संबंधों में संतुलन बनाए रखने का प्रयास करता है, जिससे भारतीय हिमालय क्षेत्र (आईएचआर) में स्थिरता बनाई रखी जा सके। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए संस्थान प्राकृतिक और सामाजिक विज्ञानों के पारस्परिक संबंधों पर जोर देते हुए अपने सभी अनुसंधान और विकास कार्यक्रमों में बहु-विषयक और समग्र दृष्टिकोण का अनुसरण करता है। इस प्रयास में नाजुक पर्वतीय पारितंत्रों, ज्ञान प्रणालियों और प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग के संरक्षण पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाता है। विभिन्न कार्यक्रमों की दीर्घकालिक स्वीकार्यता और सफलता के लिए स्थानीय निवासियों की भागीदारी सुनिश्चितत करने के लिए एक सार्थक प्रयास किया जाता है। विभिन्न हितधारकों के लिए प्रशिक्षण,पर्यावरण शिक्षा और जागरूकता संस्थान के सभी अनुसंधान और विकास कार्यक्रमों के आवश्यक घटक हैं।

 

 

व्यापक उद्देश्य (अधिदेश)..... 

 

अनुसंधान और विकास संकल्पना.....

    

    संस्थान के अनुसंधान और विकास कार्यक्रमों को हितधारकों की आवश्यकताओं के आधार पर तीन कार्य समूहों और छह विषयगत क्षेत्रों में पुनर्भिविन्यासित किया गया हैः

समूह-1

 समूह-2

समूह-3

 

 

अनुसंधान और विकास प्राथमिकताएं.....  

विकास के विकल्प/कार्यक्रम/योजनाए

प्रदर्शन और प्रचार-प्रसार

 

प्रमुख उपलब्धियां.....

 

बहाली और पुनर्वास

 प्रभाव मूल्यांकन और न्यूनीकरण

दिशानिर्देश, कार्य योजना और नीति दस्तावेज

क्षमता निर्माण और जागरूकता

जैव विविधता संरक्षण और जैव प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग

स्वदेशी ज्ञान प्रलेखन और डाटाबेस                         

 

सहायता सुविधाएं..... 

 

संस्थान का वित्त पोषण.....

   

संस्थान पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, भारत सरकार से ही मुख्यतः वित्त प्राप्त करता है। तथापि अनुसंधान और विकास गतिविधियां काफी हद तक विभिन्न राष्ट्रीय (डीबीटी, सीएसआईआर, डीएसटी, यूजीसी, आईसीएसएसआर, आईएनएसए, आईसीए, यूसीओएसटी एनईसी, सिक्किम सरकार, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया, आदि) और अंतरराष्ट्रीय (आईसीआईएमओडी, यूनेस्को, नोराड, टीएसबीएफ, सीडा-एसआईसीआई, मैक आर्थर फाउंडेशन, बीसीएन, टीएमआई, यूएनडीपी, एफएओ, यूनिडो, यूनिसेफ, आदि) एजेंसियों से प्राप्त बाह्य वित्त के माध्यम से संचलित की जाती हैं।

 

 

सेवाएं..... 

 

संस्थान ने मानव संसाधन विकास के लिए जनता, विशेष रूप से महिलाओं, छात्रों और शिक्षकों, कर्मियों, आदि के लिए मौके पर प्रशिक्षण शिविरों/कार्यशालाओं के संचालन के माध्यम से पर्यावरण के संरक्षण और विकास में जनता की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए अनूठा तरीका विकसित किया है। मानव संसाधन विकास की दिशा में संस्थान महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है और यह परियोजना आधारित स्टाफ की प्रशिक्षित कर रहा है और संस्थान में काम करते हुए अनेक भारतीय छात्रों ने पीच.डी की डिग्री प्रात्त की है। इसके अलावा संस्थान ने भारत के विभिन्न भागों और नेपाय, भूटान, हॉलैंड, कनाडा, जर्मनी, आदि जैसे देशों में छात्रों और विजिटिंग वैज्ञानिक के लिए काम किया है।

    अनुसंधान और विकास गतिविधियों के अलावा संस्थान के पास सहायता सुविधाएं और पुस्तकालय, तरुवाटिका, वीडियोग्राफी, नर्सरी, इंस्ट्रमेंटेशन सेंटर, परामर्श, परियोजना निरूपण, मिट्टी, पानी विश्लेषण, टिशू कल्चर, डाटा प्रोसेसिंग और सूचना प्रणाली, प्रशिक्षण कार्यक्रम, कार्यशाला और सेमिनार के आयोजन की सुविधाएं उपलब्ध हैं।

 

 

संस्थान से सूचना का प्रसार..... 

 

संस्थान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय  पत्रिकाओं, पुस्तकों और संपादित संस्करणों, शोध पत्रों के प्रकाशन के माध्यम से अपने अनुसंधान और विकास गतिविधियों के निष्कर्षों का प्रसार करता है।